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मनुष्य की अनुशासनहीनता

ईश्वर की बनाई हर वस्तु अनुशासन में चलती है,

जड़ हो या, हो वह चेतन निज धर्म नहीं बदलती है।

फिर उसकी बनाई सर्वश्रेष्ठ कृति मानव को क्या हो गया,

क्यों वह अपने रचनाकार की आज्ञानुसार न चलती है ?

जिस बुद्धि विवेक को पाकर सर्वश्रेष्ठ वह कहलाया है,

क्यों उस बुद्धि विवेक का समुचित उपयोग न करती है ?

पछताता होगा वह ईश्वर भी अपनी इस अद्भुत रचना पर,

बनाया जिसे सर्वश्रेष्ठ उसने उसके ही अनुचित कर्मों पर।

अहंकार हर पाप की जननी नहीं अहंकार को पालें हम,

इस अहंकार का करके परित्याग उसकी लाज बचालें हम।

मानव हैं मानव वृत्ति अपना, मानवता को बचालें हम,

अपने उस जीवनदाता के प्रति कुछ तो फर्ज़ निभालें हम।

*** डॉ पांचाल


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