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चरित्र निर्माण

मनुष्य को चरित्र निर्माण करने के लिए स्वयं की आकांक्षाएं व् अपने मन मस्तिष्क में उत्पन्न सभी इच्छाओं का दमन करना होता है | चरित्र निर्माण एक बगीचे की तरह नहीं होना चाहिए जिसमें कोई भी विचरण कर सके चरित्र निर्माण एक गगन की तरह होना चाहिए जिसको हर मनुष्य छूने की चाह रखता हो |

*** डॉ पांचाल


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