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अपराध में दोषी कौन मन या नेत्र ?

मन व् नेत्रों में आत्मिक सम्बन्ध है, मन बहुत ही चंचल है मन किसी के नियंत्रण में नहीं होता सृष्टि से अब तक सभी ऋषि, मुनि,ज्ञानी व विद्वान भी इस मन को समझने में असमर्थ ही रहे हैं | कभी मन कुछ कहता है, कभी मन कुछ करता है, कभी मन कुछ सोचता है, कभी अपराध भी करवा देता है कभी दयालु भी बन जाता है मनुष्य की समझ से परे है |

मेरे विचार से मनुष्य के नेत्र भी अपराध को निमंत्रण देते हैं यदि किसी वस्तु को प्राप्त करने की चाह हो तो यही नेत्र हमें चोरी करने के लिए उकसाते है, बलात्कार जैसे अपराध की शुरुआत भी इन्हीं नेत्रों के द्वारा होते हैं ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें यह प्रमाणित किया जा सकता है कि प्रथम नेत्रों ने ही मनुष्य को अपराधी बना दिया क्यूंकि मनुष्य मन के नेत्र का प्रयोग नहीं कर पाता | यदि मनुष्य दृष्टिहीन होता है तो वह चोरी व् बलात्कार जैसे अपराध करने में सक्षम नहीं होता है तो अपराध होने पर किसे दोष दिया जाये नेत्रों को या मन को ? मन किसी के वश में नहीं होता है |


*** डॉ पांचाल


#crime#eyes#soul#mind#brain


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